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🏹 रामायण

भाग 32: लंका त्याग, वानर सेना का संदेह और श्रीराम का महान अभय दान (शरणागति)

महर्षि वाल्मीकि — रामायण9 मिनट का पठन
भाग 32: लंका त्याग, वानर सेना का संदेह और श्रीराम का महान अभय दान (शरणागति)

अपनी मातृभूमि लंका और अपने बड़े भाई रावण द्वारा भरी सभा में अपमानित होने के पश्चात, विभीषण अपने चार अत्यंत विश्वस्त मंत्रियों (अनल, पनस, संपाती और प्रभाती) के साथ आकाश मार्ग से उड़ चले। यद्यपि उनके हृदय में अपनी जन्मभूमि के छूटने की गहरी पीड़ा थी, परंतु उससे कहीं अधिक आनंद और व्याकुलता साक्षात परब्रह्म श्रीराम के दर्शनों की थी।

समुद्र को लांघकर जब विभीषण उत्तरी तट पर पहुँचे, तो उन्होंने नीचे एक अत्यंत अद्भुत दृश्य देखा। मीलों तक फैली हुई वानरों और भालुओं की वह अनंत सेना श्रीराम के शिविर की रक्षा कर रही थी। विभीषण तुरंत नीचे नहीं उतरे, बल्कि वे अपने मंत्रियों के साथ आकाश में ही मंडराने लगे।

तभी नीचे पहरा दे रहे सुग्रीव और अन्य वानर सेनापतियों की दृष्टि आकाश में मंडराते हुए उन पांच शस्त्रधारी राक्षसों पर पड़ी। सुग्रीव ने तुरंत अपने वानरों को सतर्क किया और श्रीराम के पास जाकर अत्यंत चिंता के साथ कहा:

"हे प्रभु! सावधान हो जाइए! आकाश में शस्त्र धारण किए हुए कुछ मायावी राक्षस मंडरा रहे हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि रावण ने हमारे शिविर का भेद जानने और हमारी सेना में फूट डालने के लिए अपने गुप्तचरों को भेजा है। मैं आज्ञा चाहता हूँ कि अभी उड़कर उन्हें रस्सियों से बंदी बना लूँ और उनका वध कर दूँ!"

श्रीराम अत्यंत शांत और धीर थे। उन्होंने मुस्कुराते हुए सुग्रीव से कहा, "मित्र! राजनीति कहती है कि किसी भी अजनबी के प्रति तुरंत कोई कठोर निर्णय नहीं लेना चाहिए। पहले यह तो पता करो कि वे कौन हैं और किस उद्देश्य से यहाँ आए हैं?"

तभी आकाश से विभीषण ने अत्यंत उच्च, स्पष्ट और करुण स्वर में घोषणा की:

"हे वानर राज सुग्रीव! मैं लंकापति रावण का छोटा भाई विभीषण हूँ। मैंने रावण को माता सीता को ससम्मान लौटाने की सलाह दी थी, परंतु काल के वश में होकर उसने मेरा घोर अपमान किया और मुझे लात मारकर लंका से निकाल दिया। मेरे पास अब कोई आश्रय नहीं है। मैं अपना परिवार, संपत्ति और सर्वस्व त्याग कर रघुकुल नंदन श्रीराम की शरण में आया हूँ। कृपया प्रभु को मेरी सूचना दें।"

'रावण का सगा भाई'—यह शब्द सुनते ही वानर सेना में खलबली मच गई। सुग्रीव का संदेह और गहरा हो गया। उसने श्रीराम से कहा, "प्रभु! यह रावण का सगा भाई है। राक्षस स्वभाव से ही मायावी, छली और क्रूर होते हैं। यह अवश्य ही हमसे मित्रता का नाटक करके हमारे भीतर प्रवेश करेगा और युद्ध के समय हमारी पीठ में खंजर घोंप देगा। इसे शरण देना आस्तीन में सांप पालने के समान है। मेरी स्पष्ट सलाह है कि इसे तुरंत बंदी बना लिया जाए।"

श्रीराम ने अपनी वानर सभा की ओर देखा। जाम्बवंत, अंगद और अन्य सेनापतियों ने भी सुग्रीव की बात का ही समर्थन किया कि शत्रु के भाई पर विश्वास करना आत्महत्या के समान है।

अंत में श्रीराम ने हनुमान जी की ओर देखा, जो अब तक अत्यंत शांत खड़े थे। श्रीराम ने पूछा, "हनुमान, तुम लंका जाकर आए हो। तुमने वहां की स्थिति देखी है। तुम्हारा क्या विचार है?"

हनुमान जी ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रता से कहा, "हे प्रभु! आप तो अंतर्यामी हैं, आपसे क्या छिपा है? सुग्रीव जी की नीति राज्य और सेना की सुरक्षा की दृष्टि से बिल्कुल सही है। परंतु मैंने लंका में विभीषण का आचरण देखा है। राक्षसों की उस तामसी और पापी नगरी में केवल इसी व्यक्ति के घर के द्वार पर आपका नाम लिखा था और आंगन में तुलसी का पौधा लगा था। जब मुझे ब्रह्मास्त्र से बांधकर रावण के सामने ले जाया गया था और रावण मुझे मृत्युदंड दे रहा था, तब इसी विभीषण ने अपने प्राणों की परवाह न करते हुए मेरी रक्षा के लिए रावण से तर्क किया था। प्रभु, यह कोई गुप्तचर नहीं है। गुप्तचर कभी इस प्रकार अपना नाम और परिचय बताकर खुलेआम शत्रु के शिविर में नहीं आते। मेरा हृदय कहता है कि यह आपका सच्चा भक्त है और हमें इसे अपना लेना चाहिए।"

हनुमान जी के इन वचनों को सुनकर श्रीराम का मुखमंडल एक अलौकिक और दिव्य तेज से चमक उठा। उन्होंने अपने आसन से उठकर एक ऐसी महान घोषणा की, जो सनातन धर्म में 'शरणागति' का सबसे बड़ा और अमर सिद्धांत बन गई।

श्रीराम ने अत्यंत ओजस्वी, करुणा भरे और दृढ़ स्वर में कहा:

"हे सुग्रीव! तुम्हारी राजनीति और राज्यशास्त्र अपनी जगह है, परंतु मेरे जीवन का धर्म कुछ और ही है। यदि कोई भी प्राणी भयभीत होकर या आश्रय की आस में मेरी शरण में आता है, तो चाहे वह संपूर्ण जगत का सबसे बड़ा अपराधी ही क्यों न हो, मैं उसे कभी नहीं त्यागता।"

श्रीराम ने अपने दोनों हाथ फैलाते हुए आगे कहा, "कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥ (अर्थात: यदि किसी मनुष्य ने करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या का घोर पाप भी किया हो, और वह सच्चे मन से मेरी शरण में आ जाए, तो मैं उसे भी क्षमा कर देता हूँ)। अरे सुग्रीव! विभीषण तो क्या, यदि आज साक्षात रावण भी अपनी हार मानकर और सीता को लौटाकर मेरी शरण में आ जाए, तो मैं उसे भी क्षमा कर दूँगा और अपने गले से लगा लूँगा। जाओ, विभीषण को पूरे आदर और सम्मान के साथ मेरे पास ले आओ।"

श्रीराम की इस असीम करुणा और विशाल हृदय को देखकर पूरी वानर सेना नतमस्तक हो गई। हनुमान और अंगद आदरपूर्वक विभीषण को आकाश से नीचे ले आए। अब एक भक्त और भगवान का वह मिलन होने वाला था, जिसकी प्रतीक्षा विभीषण जन्मों से कर रहे थे।

🎉 कहानी समाप्त

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